रामायण महाकाव्य में शरभंग मुनि का विशेष स्थान है। उनकी तपस्या, त्याग, और श्रीराम के प्रति अनन्य भक्ति ने उन्हें ब्रह्मज्ञान और मोक्ष के मार्ग का प्रतीक बना दिया। दंडकारण्य में स्थित उनके आश्रम में उन्होंने गहन तपस्या की, जिससे देवता भी प्रभावित हुए।
धार्मिक कथाओं के अनुसार, शरभंग मुनि की कठोर साधना से प्रसन्न होकर स्वयं ब्रह्मा जी उनके पास स्वर्ग का प्रस्ताव लेकर आए। ब्रह्मा जी अपने दिव्य विमान के साथ शरभंग मुनि को स्वर्ग ले जाना चाहते थे, लेकिन मुनि ने यह प्रस्ताव विनम्रता से ठुकरा दिया
शरभंग मुनि का एकमात्र उद्देश्य भगवान श्रीराम के दर्शन करना और उनके माध्यम से मोक्ष प्राप्त करना था। मुनि को ज्ञात था कि सच्चा मोक्ष और परमात्मा का सान्निध्य केवल भगवान श्रीराम के चरणों में ही संभव है।
जब भगवान श्रीराम अपने वनवास के दौरान शरभंग मुनि के आश्रम पहुंचे, तो मुनि ने उनका अत्यंत आदरपूर्वक स्वागत किया। उन्होंने अपनी वर्षों की तपस्या का फल भगवान श्रीराम को समर्पित कर दिया। इसके बाद शरभंग मुनि ने योग-आग्नि में प्रवेश कर ब्रह्मलीनता प्राप्त की।
शरभंग मुनि की कथा यह सिखाती है कि सच्चा मोक्ष केवल ईश्वर की भक्ति और चरणों में पूर्ण समर्पण से संभव है। उन्होंने यह संदेश दिया कि भले ही स्वर्ग का प्रस्ताव कितना भी आकर्षक क्यों न हो, आत्मा का परम लक्ष्य परमात्मा से मिलन ही होना चाहिए।